Friday, January 28, 2011

मेरी घटना

क्रोध हर कोने से टपकता है
आंखे लाल हो जाती हैं ।
वो कुछ घंटे बात नहीं करती
फ़िर सो जाती है ॥

मनाने का असर नही होता
हर कोशिश व्यर्थ नज़र आती है ।
यह घटना दिन मे दो बार
तो हो ही जाती है ॥

फ़िर वो ऐसी बात करती है
जैसे कुछ हुआ ही नहीं ।
जिंदगी की गाडी फ़िर पटरी
पर आ जाती है ॥

यह घटना दिन मे दो बार
तो हो ही जाती है ॥

हम समझतें है एक दूसरे को
पर ना जाने बात कहाँ बिगड जाती है ।
इस मौन क्रोध की लम्बी अवधि मे
सिर्फ़ कुण्ठा ही रह जाती है ॥

यह घटना दिन मे दो बार
तो हो ही जाती है ॥

संवाद के अभाव मे अधीरता के प्रभाव से
यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।
वो दिल की अच्छी है मगर,
जरा रोष मे खो जाती है ॥

यह घटना दिन मे दो बार
तो हो ही जाती है ॥

यह घटना दिन मे दो बार
तो हो ही जाती है ॥

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